उत्तराखंड के चारधाम में से एक गंगोत्री के दर्शन के लिए देवस्थानम् बोर्ड कर रहा रजिस्ट्रेशन,

 

25 जुलाई से उत्तराखंड के चार धामों की यात्रा अन्य राज्यों के लिए भी शुरू कर दी गई थी। इसके बाद से देशभर से लोग उत्तराखंड चार धाम देवस्थानम् बोर्ड की वेब साइट पर दर्शन के लिए रजिस्ट्रेशन करा रहे हैं। लेकिन, गंगोत्री मंदिर में आम दर्शनार्थियों के लिए मंदिर के बाहर से दर्शन करने की व्यवस्था की गई है।

गंगोत्री धाम मंदिर समिति के अध्यक्ष सुरेश सेमवाल ने बताया इस समय राज्य में भी कोरोना संक्रमण तेजी फैल रहा है। ऐसी स्थिति में मंदिर के पुजारियों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हम मंदिर के अंदर दर्शनार्थियों को प्रवेश नहीं दे रहे हैं। भक्तों को मंदिर के बाहर से ही दर्शन करने होंगे। अगर भक्त मंदिर के अंदर आएंगे तो मंदिर से जुड़े लोगों से उनका संपर्क होगा, जो कि पुजारियों के स्वास्थ्य के लिए ये सही नहीं रहेगा। इसीलिए हम अभी भक्तों को मंदिर के अंदर से दर्शन कराने के पक्ष में नहीं हैं। इस संबंध में मंदिर समिति ने यहां के डीएम के माध्यम से राज्य सरकार से अपील की है कि अभी कोरोना को देखते हुए दर्शन व्यवस्था शुरू नहीं करनी चाहिए।

उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम् बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रविनाथ रमन के कहा कि किसी भी दर्शनार्थी को मंदिर के अंदर प्रवेश करने से रोकना विधि विरुद्ध है। इस संबंध में जिला प्रशासन को आदेश दे दिया है। अगर किसी दर्शनार्थी को मंदिर में दर्शन करने से रोका जाता है तो एफआईआर दर्ज की जाएगी।

बोर्ड के मीडिया प्रभारी डॉ. हरीश गौड़ के अनुसार अन्य प्रदेशों से आने वाले भक्तों को नए नियमों के मुताबिक, 72 घंटे पहले की कोरोना निगेटिव रिपोर्ट और देवस्थानम बोर्ड द्वारा जारी ई-पास लेकर आना होगा। तभी उन्हें यहां दर्शन करने की अनुमति दी जाएगी। साथ ही, भक्तों को सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क और सैनिटाइजेशन का विशेष ध्यान रखना होगा।

गंगोत्री क्षेत्र में भागीरथ ने की थी तपस्या

गंगोत्री से गंगा नदी का उद्गम होता है। यहां देवी गंगा का मंदिर है। समुद्र तल से ये मंदिर 3042 मीटर की ऊंचाई पर है। ये स्थान जिला उत्तरकाशी से 100 किमी की दूर है। हर साल गंगोत्री मंदिर मई से अक्टूबर तक के लिए खोला जाता है। बाकी समय में यहां का वातावरण प्रतिकूल रहता है, इसीलिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस क्षेत्र में राजा भागीरथ ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। शिवजी यहां प्रकट हुए और उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उसका वेग शांत किया था। इसके बाद इसी क्षेत्र में गंगा की पहली धारा भी गिरी थी।

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